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चीख खामोशी की
जहन-ऐ-जमीन के दो गज कोने में,खाक अतीत तले जिसको दफनाया है,चीख उठी है ये खामोशी फिर से,जो गुजर गया क्या वो मेरा ही साया है। अंजुली में भी खाक भरी थीजब उन तारों को ललकारा था,हाँ देखा था मैने भी एक सपना,शायद यही कसूर हमारा था। ना ख्वाब बचा ना ललकार बची,इस वक्त ने कैदे…
क्या मैं खुद को जानता हु
आईने में रोज़ खुद को, घंटों खड़े निहारता हु,क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु। आईना भी अब लगे है, थोड़ा सा कुछ मजबूर सा,क्या दिखाए सोचता है, कोई पहलू तस्वीर का,हर पहलू है दस्तूर कोई, सहमा खड़ा विचरता हु,क्या मैं बस खुद को छोड़, हर किसी को जानता हु। फैली…
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